
दीर्ध प्राणायाम को से छाती, फेफड़े और झिल्लियों की मांसपेशियां इससे मजबूत और स्वस्थ रहती है. इस योग के अभ्यास से शरीर तनाव मुक्त रहता है एवं फुर्ती बनी रहती है
प्राणायाम को दीर्घायु प्रदान करने वाला कहा गया है. योग के पिता पतंजलि ने प्राणायाम के चार प्रकार बताए हैं. प्राणायाम में सांस को नियंत्रित किया जाता है. यह श्वास प्रश्वास पर आधारित योग होता है. इस योग से कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं.
दीर्घ प्राणायाम के लाभ (Benefits of Dirgha Pranayama)
दीर्ध प्राणायाम को पूर्ण योग श्वसन के नाम से भी जाना जाता है. इस योग के करने से श्वसन तंत्र स्वस्थ रहता है. छाती, फेफड़े और झिल्लियों की मांसपेशियां इससे मजबूत और स्वस्थ रहती है. इस योग के अभ्यास से शरीर तनाव मुक्त रहता है एवं फुर्ती बनी रहती है. यह योग मानसिक शांति एवं चेतना के लिए भी लाभप्रद होता है.
दीर्ध प्राणायम मे श्वसन क्रिया (Dirgha Pranayama & Breathing)
इस योग को करते समय योग करने वाले को पेट की गति अर्थात संकुचन पर ध्यान रखना चाहिए साथ ही छाती और पेशियों पर भी दृष्टि रखनी चाहिए. इस योग में योगाभ्यासी को अपने कंधों में भी श्वसन की लय को महसूस करना चाहिए. जब आप सांस लेते हैं तो आपके दोनों कंघे ऊपर आते हैं और सांस छोड़ते हुए नीचे की ओर जाते हैं. इस योग में छाती, पसलियां और फिर पेट तीनों का व्यायाम हो जाता है. योग की क्रिया के दौरान शरीर को सामान्य और सहज मुद्रा में रखना चाहिए. श्वसन क्रिया में विशेष बल नहीं लगाना चाहिए और आराम से सांस लेना और छोड़ना चाहिए. इस योग में पहले छाती फिर पसलियां इसके पश्चात पेट श्वसन क्रिया में भाग लेता है अत इसे तीन चरण श्वसन भी कहा जाता है.
सावधानी
जिन लोगों को श्वसन सम्बन्धी रोग या परेशानी है अथवा फेफड़ों में कुछ शिकायत है उन्हें इस योग को करने से पहले चिकित्सक और योग शिक्षक से सलाह लेनी चाहिए तभी अभ्यास करना चाहिए.
योग की प्रकिया (breath awareness exercise)
योग शुरू करते समय आराम की मुद्रा में ज़मीन पर पीठ के बल लेटना चाहिए. हथेलियों को पेट पर हल्के से रखना चाहिए. दोनों हाथों की मध्यमा उंगली नाभि पर एक दूसरे को स्पर्श करता रहे. धीरे धीरे सांस छोड़ते हुए पेट को ज़मीन की दिशा में ले जाइये. फिर धीरे धीरे सांस खींचते हुए पेट को फुलाइये. इस क्रिया को 5 मिनट तक बार बार दुहराना चाहिए. सांस को पहले छाती में महसूस करना चाहिए, फिर पसलियों में फिर पेट में. इस क्रिया को धीरे धीरे और आराम से करना चाहिए.