सुप्त परिवर्तनासन और सुप्त मत्स्येन्द्रासन – Supta parivartanasana and Supta matsyendrasana yoga mudra

by Acharya Shashikant · 1 comment

सुप्त परिवर्तनासन का अभ्यास लेटकर किया जाता है एवं इसमें जंघा के ऊपर जंघा रखकर बारी बारी से परिवर्तन किया जाता है अत: इसे इस नाम से जाना जाता है. इस आसन में अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए एवं यह आसन किस प्रकार लाभदायक होता है

सुप्त परिवर्तनासन लाभ
इस आसन में जांघ के ऊपर जांघ को रखकर घूमाने की क्रिया से मेरूदंड और हिप्स का व्यायाम होता है जिससे शरीर के इस भाग मे मौजूद तनाव दूर होता है.कमर एवं छाती के लिए भी यह आसन लाभकारी होता है.इससे छाती फैलती है व कमर मजबूत एवं लचीला होता है.योग की इस मुद्रा के पाचन तंत्र सुदृढ़ होता एवं भूख अच्छी लगती है.अनिद्रा की समस्या से पीड़ित लोगों को इस आसन से मानसिक शांति मिलती है व शरीर रिलैक्स होता है जिससे नींद न आने की समस्या दूर होती है.

सुप्त परिवर्तनासन अवस्था
इस आसन का अभ्यास करते समय जब आप घूमते हैं उस समय अगर बांहें ज़मीन से उठ जाती हैं तो बाजू और कंधों को पीछे ले जाकर ज़मीन से लगा लेना चाहिए.जंघा के ऊपर जंघा चढ़ाकर जब योग क्रिया कर रहे हों उस समय सामान्य रूप से श्वास प्रश्वास करते रहना चाहिए.शरीर को कड़ा नहीं करें बल्कि लचीला बनाये रखें.

सावधानियां
जब कमर में किसी प्रकार की परेशानी हो अथवा रीढ़ की हड्डी में कष्ट महसूस हो उस समय इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.हिप्स में तकलीफ होने पर भी इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.

योग क्रिया
स्टेप 1 पीठ के बल लेट जाएं और घुटनों को मोड़ लें. इस अवस्था में दोनों पैर एक दूसरे के करीब होने चाहिए और तलवे जमीन पर टिके हुए होने चाहिए. स्टेप 2 बांहों को शरीर से दूर दोनों तरफ फैलाकर रखें.हथेलियां को छत की दिशा में रखना चाहिए. स्टेप 3 बाएं पैर को दाएं पैर पर रखें.इस स्थिति में दोनों जंघाएं एक दूसरे से लगे होने चाहिए. स्टेप 4 सांस छोड़ते हुए बाएं घुटने को बायीं तरफ जमीन से लगाएं. स्टेप 5 सिर को दायीं ओर घुमाएं और दाएं हाथ को देखें. स्टेप 6 इस मुद्रा में 15 से 45 सेकेण्ड में बने रहें.सांस लेते हुए घुटनों को बीच में लाएं और पैरों को ज़मीन पर आराम की मुद्रा में रखें. स्टेप 7 इस मुद्रा का अभ्यास दोनों तरफ 3 से 6 बार करना चाहिए.

सुप्त मत्स्येन्द्रासन  (Supta matsyendrasana)
सुप्त परिवर्तन आसन के समान सुप्त मत्स्येन्द्रासन का अभ्यास भी पीठ के बल लेटकर किया जाता है.इस आसन की मुद्रा मत्स्येन्द्रासन से काफी मिलती है अत: इसे सुप्त मत्स्येन्द्रासन के नाम से जाना जाता है.यह आसन का अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए एवं यह आसन किस प्रकार लाभप्रद होता है इस विषय पर आइये विचार करें.

सुप्त मत्स्येन्द्रासन के लाभ

सुप्त मत्स्येन्द्रासन अवस्था
इस आसन में सबसे अहम है घुटनों का ज़मीन से टिका रहना अत: इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अभ्यास के दौरान घुटने ज़मीन से सटे हुए हों.कंधों को भी आसन के दौरान ज़मीन से उठाना नहीं चाहिए.इस आसन में शरीर का लचीला रहना बहुत ही आवश्यक होता है अत: आसन के दौरान शरीर को कड़ा करके नहीं रखना चाहिए.

सावधानियां
इस आसन का अभ्यास उस समय नहीं करना चाहिए जबकि रीढ़ की हड्डियों में किसी प्रकार की तकलीफ हो.कमर, हिप्स और घुटनों में परेशानी महसूस होने पर भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए.

योग क्रिया
स्टेप 1 पीठ के बल लेट जाएं. इस अवस्था में एक साथ और शरीर से दूर सीधे होने चाहिए. स्टेप 2 बांहों को शरीर से दूर दोनों तरफ फैलाकर रखें.हथेलियों को भूमि से लगाकर रखें. स्टेप 3 सिर को पीछे की ओर और हाथ एवं पैरो की उंगलियो को बाहर की ओर खींचें. स्टेप 4 दाएं पैर को मोड़ें. स्टेप 5 दाएं तलवे को बाएं घुटने पर रखें. स्टेप 6 सांस छोड़ते हुए दाएं घुटने को बायीं ओर भूमि से लगाएं. स्टेप 7 सिर को दायीं ओर घूमाकर दाएं कंधे को देखें. स्टेप 8 इस मु्द्रा में 20 सेकेण्ड से 1 मिनट तक बने रहें. स्टेप 9 सांस लेते हुए दाएं घुटने और सिर को बीच मे लाएं.धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं. स्टेप 10 इस मुद्रा का अभ्यास दूसरी तरफ भी 4 से 9 बार करें.

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Ragahav March 1, 2011 at 2:33 pm

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